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Monday, 9 January 2023

 हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ताइफ़ के सफ़र का किस्सा

नुबुव्वत मिल जाने के बाद नौ वर्ष तक नबी अकरम सल्लल्लाहु सल्लम मक्का मुकर्रमा में तब्लीग फर्माते रहे, और कौम की हिदायत और , की कोशिश फमति रहे, लेकिन थोड़ी सी जमाअत के सिवा, जो थी और थोड़े से ऐसे लोगों के अलावा जो बावजूद मुसलमान न होने के मदद करते थे, अक्सर कुष्कारे मक्का आपको और आप के सहाबा र तरह की तकलीफें पहुंचाते थे, मजाक उड़ाते थे और जो हो सकता था, उस न करते थे। आप (द उन

हुजूर सल्ल. के चचा अबूतालिब भी उन्हीं नेक दिल लोगों में ये जो मुसलमान न होने के हुज़ूर सल्ल० की हर किस्म की मदद फ़र्माते थे। दसवें सत् में जब अबूतालिब का भी इन्तिकाल हो गया तो काफिरों को और भी हर तरह मुहार' इस्लाम से रोकने और मुसलमानों को तकलीफ पहुंचाने का मौका हुजूर सल्ल० इस ख़्याल से ताइफ तशरीफ ले गये कि वहां कबीला सकीफ की जमाअत है। अगर वह क़बीला मुसलमान हो जाये तो मुसलमानों को इन तक


से निजात मिले और दीन के फैलने की बुनियाद पर जाए। जहां पहुंचकर के तीन सरदारों से, जो बड़े दर्जे के समझे जाते थे, गुफ्तगू फर्माई और अल्लाह के दीन की तरफ बुलाया और अल्लाह के रसूल की यानी अपनी मदद की तरफ मुत किया मगर उन लोगों ने बजाय इसके कि दीन की बात को कुबूल करते या कम से कम अरब की मशहूर मेहमान नवाजी के लिहाज से एक नौ-वारि मेहमान की खातिर मुदारात करने से साफ जवाब दे दिया और निहायत वे रूसी और बद- अल्लाको से पेश आये। उन लोगों ने यह भी गवारा न किया कि आप यहां कियाम फर्मा लें। जिन लोगों को सरदार समझ कर यह बात की थी कि शरीफ होंगे और मुहज्जब गु करेंगे, उनमें से एक शख्स बोला, कि ओहो, आप को ही अल्लाह ने नबी बनाकर भेजा है, दूसरा 'बोला कि अल्लाह को तुम्हारे सिवा कोई और मिलता ही नहीं था, जिसको रसूल बनाकर भेजते। तीसरे ने कहा, मैं तुझसे बात नहीं करना चाहता, इसलिए के अगर तू वाकई नबी है जैसा कि दावा है, तो तेरी बात से इन्कार कर देना मुसीबत से खाली नहीं, अगर झूठ है तो मैं ऐसे शख्स से बात नहीं करना चाहता। इसके बाद उन लोगों से ना उम्मीद होकर हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने और लोगों से बात करने का इरादा फर्माया कि आप तो हिम्मत और इस्तिक्लाल के पहाड़ थे, मगर किसी ने भी कुबूल न किया, बल्कि बजाए कुबूल करने के हुजूर सल्ल० से कहा कि हमारे शहर से फौरन निकल जाओ और जहां तुम्हारी चाहत की जगह हो, वहां चले जाओ। हुजूरे अकरम सल्ल, जब उनसे बिल्कुल मायूस होकर वापस होने लगे तो उन लोगों ने शहर के लड़कों को पीछे लगा दिया कि आप का मजाक उड़ायें, तालियां पीटें, पत्थर मारे, हत्ता कि आप के दोनों जूते खून के जारी होने से रंगीन हो गये। हुजूरे अवदस सल्ल. इसी हालत में वापस हुए। जब रास्ते में एक जग इन शरीरों से इत्मीनान हुआ, तो हुजूर सल्ल. ने यह दुआ मांगी-


‫وهو اني عَلَى النَّاسِ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ أَنتَ‬‎ ‎‫امر إلى عدد ملكته أمر‬‎ ‎‫رَبُّ الْمُسْتَضْعَفِيرُ وانت ربي إلى من‬‎ ‎‫نور وجهك الله‬‎ ‎‫فلا أبا لي ولكن عافيتك هى أوسع إلى‬‎ ‎‫اشْرَقْتَ لَ الظُّلُمَاتُ وَصَلَحَ عَلَي امر الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ مِنْ أَنْ يَنزِلَ فِي عَضَبَكَ أَدْعِيل‬‎ ‎‫عَلَى سَخَطَكَ لَكَ الْعَتُمُ حَتَّى تَرْضى وَلا حول ولا قوة الايك (كذافي سيرة ابن هشام قلت)

ऐ अल्लाह तुझी से शिकायत करता हूं मैं अपनी कमज़ोरी और बेकसी की
और लोगों में जिल्लत व रुसवाई की। ऐ अर्हमर्राहमीन! तू ही जुअफा का रख है दुश्मन और तू ही मेरा परवरदिगार है। तू मुझे किस के हवाले करता है। किसी अजनबी बेगाने के, जो मुझे देख कर तुर्शरूर होता है और मुंह चिढ़ाता है या कि किसी के, जिसको तूने मुझ पर काबू दे दिया। ऐ अल्लाह ! अगर तू मुझ से नाराज नहीं है तो मुझे किसी की भी परवाह नहीं है। तेरी हिफ़ाज़त मुझे काफी है। मैं तेरे चेहरे के उस नूर के तुफैल, जिससे तमाम अंधेरियां रौशन हो गयीं और जिससे दुनिया और आखिरत के सारे काम दुरुस्त हो जाते हैं, इस बात से पनाह मांगता हूं कि मुझ पर तेरा गुस्सा हो या तू मुझसे नाराज़ हो, तेरी नाराजगी का उस वक्त तक दूर करना, ज़रूरी है जब तक तू राजी न हो, न तेरे सिवा कोई ताकत हैं, न कुव्वत ।

मालिकुल मुल्क की शान कहहारी को इस पर जोश आना ही था कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने आकर सलाम किया और अर्ज़ किया कि अल्लाह तआला ने आपकी क़ौम की वह गुफ्तगू, जो आप से हुई, सुनी और उनके जवाबात सुने और एक फरिश्ते को जिस के मुताल्लिक पहाड़ों की खिदमत है, आप के पास भेजा है कि आप जो चाहें उसको हुक्म दें। इसके बाद उस फ़रिश्ते ने सलाम किया, और अर्ज़ किया कि जो इर्शाद हो, मैं उसकी तामील करूं ! अगर इर्शाद हो तो दोनों जानिव के पहाड़ों को मिला दूं जिससे यह सब दर्मियान में कुचल जायें या और जो सजा आप तज्वीज़ फमयेिं । हुज़ूर सल्ल० की रहीम व करीम जांत ने जवाब दिया कि मैं अल्लाह से इसकी उम्मीद रखता हूं कि अगर यह मुसलमान नहीं हुए तो इनकी औलादों में से ऐसे लोग पैदा हों जो अल्लाह की परिस्तिश करें और उसकी इबादत करें।

फु- यह है अता उस करीम जात के जिस के हम लोग नाम लेवा है

कि हम ज़रा सी तकलीफ से किसी को मामूली गाली दे देने से ऐसे भड़क जाते हैं कि फिर उम्र भर उसका बदला नहीं उतरता ! जुल्म पर जुल्म करते रहते हैं और वा करते हैं अपने मुहम्मदी होने का, नबी के पैरू बनने का। नबी करीम सल्लल्लाहु लैहि व सल्लम इतनी सख्त तकलीफ और मशक्कत उठाने के बावजूद न बद-दुआ करमाते हैं, न कोई बदला लेते हैं।
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